राजयोग वैदिक ज्योतिष में सबसे ज़्यादा चर्चित योगों में से एक है, पर इसका बनना किसी एक ग्रह से नहीं, दो तरह के भावों के आपसी संबंध से तय होता है।
बुनियादी नियम
कुंडली में केंद्र भाव (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण भाव (1, 5, 9) को सबसे मज़बूत माना जाता है। जब इन दोनों समूहों के स्वामी ग्रह आपस में जुड़ते हैं, तो राजयोग बनता है। यह जुड़ाव तीन तरह से हो सकता है:
- दोनों स्वामी एक ही भाव में साथ बैठे हों (युति)
- दोनों एक-दूसरे को दृष्टि से देखते हों (मिलनसार दृष्टि)
- दोनों आपस में भाव बदल लें (राशि परिवर्तन योग)
एक उदाहरण
अगर लग्न मेष हो, तो चौथे भाव का स्वामी चंद्रमा (कर्क) और नौवें भाव का स्वामी गुरु (धनु) हैं। अगर ये दोनों ग्रह किसी एक भाव में साथ बैठें, तो यह एक राजयोग की स्थिति मानी जाएगी।
सिर्फ योग बनना काफी नहीं
राजयोग की ताकत इस पर भी निर्भर करती है कि जुड़ने वाले ग्रह खुद कितने मज़बूत हैं (अपनी राशि, उच्च राशि या नीच राशि में), और किस भाव में बैठे हैं। कमज़ोर ग्रहों से बना योग उतना प्रभावी नहीं माना जाता।
अपनी कुंडली में जांचें
कुंडली टूल पर जन्म विवरण डालकर अपने लग्न और सभी भावों के स्वामी देखें, फिर ऊपर दिए नियम से मिलान करें।
यह जानकारी वर्णनात्मक है और भविष्यवाणी नहीं है।